Kangra



हिमाचल प्रदेश जिला-काँगड़ा

जिले के रूप में गठन-  01 नवम्बर, 1966

जिला मुख्यालय-.       धर्मशाला km

जनघनत्व-.               263 (2011 में)

साक्षरता दर-.            85.67% (2011 में)

कुल क्षेत्रफल-.          5739 वर्ग किलोमीटर।

जनसंख्या-.             15,10,075 (2011 में)

लिंग अनुपात-.         1012(2011 में)

दशकीय वृद्धि दर-.    12.77% (2001-2011)

जनसंख्या का ℅HP   22.0% (2011 में)

कुल गाँव-.              3868 (आबाद गाँव-3619)

ग्राम पंचायतें-.          760

 विकास खण्ड-.        15

ग्रामीण जनसंख्या-.    14,20,864 (94.28%) (2011 में)

शिशु लिंग अनुपात-.    876(2011 में)

 

  भूगोल

काँगड़ा हिमाचल प्रदेश के उत्तरपश्चिम में (32°40') से (32°25') उत्तरी अक्षांश तथा (70°35) से (77°°05') पूर्वी देशांतर के बीच स्थित है। काँगड़ा के दक्षिण में ऊना, हमीरपुर और मण्डी जिले है।। इसके पूर्व में कुल्लू मानाली ओर लाहौल-स्पीति।, उत्तर में चम्बा जिला. तथा पश्चिम में पंजाब की सीमाएँ लगती हैं।




इतिहास

काँगड़ा जिले के इतिहास के लिए हमें काँगड़ा, काँगड़ा आने वाला पहला यूरोपियन थॉमस कोरियाट था। कनिंघम के अनुसार रावी और सतलुज के बीच स्थित रियासतें काँगड़ा समूह की रियासतें थीं।


काँगड़ा का प्राचीन इतिहास


काँगड़ा रियासत का प्राचीन इतिहास-काँगड़ा जिला र्मा ने काँगड़ा में किले की स्थापना की ओर उसको अपनी राजधानी बनाया।


त्रिगर्त का अर्थ- त्रिगर्त का शाब्दिक अर्थ गंगा, कुराली और न्यूगल

के संगम स्थल को भी त्रिगत कहा जाता है।


(883-903) ने कश्मीर के राजा शंकरवर्मन के विरुद्ध युद्ध किया था।


 मध्यकालीन इतिहास-


महमूद गजनवी-महमूद गजनवी ने


मुगलवंश-

धर्मचंद (1528 ई. से 1563 ई.), मानिक चंद (1563 ई. से 1570 ई.), जयचंद (1570 ई. से 1585 ई.) और विधिचंद (1585 ई. से 1605 ई.) अकबर के समकालीन राजा थे। राजा जयचंद (1570 ई. से 1585 ई.) को अकबर ने गुलेर के राजा रामचंद की सहायता से बंदी बनाया था। राजा जयचंद के बेटे विधिचंद ने 1572 ई. में अकबर के विरुद्ध विद्रोह किया। अकबर ने हुसैन कुली खान को काँगड़ा पर कब्जा कर राजा बीरबल को देने के लिए भेजा। 'तबाकत-ए-अकबरी' के अनुसार खानजहाँ ने 1572 ई. में काँगड़ा किले पर कब्जा कर लिया परन्तु हुसैन मिर्जा और मसूद मिर्जा के पंजाब आक्रमण की वजह से उसे इसे छोड़ना पड़ा। अकबर ने टोडरमल को पहाड़ी क्षेत्रों को मापने के लिए भेजा। 1589 ई. में विधिचंद ने पहाड़ी राजाओं से मिलकर विद्रोह किया परन्तु उसे हार मिली। उसे अपने पुत्र त्रिलोकचंद को बंधक के तौर पर मुगल दरबार में रखना पड़ा।

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त्रिलोकचंद (1605-1612 ई.)-

त्रिलोकचंद 1605 ई. में काँगड़ा का राजा बना। उसी वर्ष जहाँगीर (1605 ई.) भी गद्दी पर बैठा था। त्रिलोकचंद जहाँगीर का समकालीन राजा था। त्रिलोकचंद (1605-1612 ई.)-और हरिचंद-II (1612-1627 ई.) जहाँगीर के समकालीन काँगड़ा के राजा थे। हरिचंद-II के समय नूरपुर के राजा सूरजमल ने विद्रोह कर चम्बा में शरण ली। सूरजमल के छोटे भाई जगत सिंह और राय रैयन विक्रमजीत की मदद से 1620 ई. में काँगड़ा किले पर नवाब अली खान ने कब्जा कर लिया। नवाब अली खान काँगड़ा किले का पहला मुगल किलेदार था। जहाँगीर अपनी पत्नी नूरजहाँ के साथ सिब्बा गुलेर होते हुए काँगड़ा आया। काँगड़ा किले में मस्जिद बनाई। वापसी में वह नूरपुर और पठानकोट होता हुआ वापस गया।


चन्द्रभान सिंह (1627 ई. से 1660 ई. तक)-काँगड़ा वंश का अगला राजा हुआ जिसे मुगलों ने राजगिर की जागीर देकर अलग जगह बसा दिया। चन्द्रभान सिंह को 1660 ई. में औरंगजेब ने गिरफ्तार किया। 


विजयराम चंद (1660 ई. से 1697 ई.)-ने बिजापुर शहर की नींव रखी और उसे अपनी राजधानी बनाया।


आलम चंद (1697 ई. से 1700 ई.)-ने 1697 ई. में सुजानपूर के पास आलमपुर शहर की नींव रखी।


हमीर चंद (1700 ई. से 1747 ई.)-आलमचंद के पुत्र हमीरचंद ने हमीरपुर में किला बनाकर हमीरपुर शहर की नीव रखी। इसी के कार्यकाल में नवाब सैफअली खान (1740 ई.) काँगड़ा किले का अंतिम मुगल किलेदार बना।


राजधानी-1660 ई. से 1697 ई. तक बीजापुर, 1697 ई. से 1748 ई. तक आलमपुर और 1761 ई. से 1824 ई. तक सुजानपुर टिहरा काँगड़ा रियासत की राजधानी रही। 1660-1824 ई. से पूर्व और बाद में काँगड़ा की राजधानी काँगड़ा शहर थी जो कि 1855 ई. में अंग्रेजों ने धर्मशाला स्थानान्तरित कर दी।

 

  काँगड़ा का आधुनिक इतिहास


 अभयचंद ( 1747 ई. से 1750 ई.)-में मृत्यु हो गई। महाराजा रणजीत सिंह ने संसार चंद के पुत्र अनिरुद्ध चंद को फतेह सिंह अहलुवालिया के साथ बंधक रखा हुआ था (1809 ई. में)। संसार चंद की मृत्यु के बाद अनिरुद्ध चंद एक लाख रुपया रणजीत सिंह को नजराना देकर गद्दी पर बैठा। 


अनिरुद्ध चंद (1824)-

महाराजा रणजीत सिंह ने अनिरुद्ध चंद से अपने प्रधानमंत्री राजा ध्यानसिंह (जम्मू) के पुत्र हीरा सिंह के लिए उसकी एक बहन का हाथ माँगा। अनिरुद्ध चंद ने टालमटोल कर अपनी बहनों का विवाह टिहरी गढ़वाल के राजा से कर दिया। अनिरुद्ध चंद स्वयं अंग्रेजों के पास अदिनानगर पहुँच गया। अनिरुद्ध चंद के चाचा फतेहचंद ने अपनी पौत्री का विवाह रणजीत सिंह के पुत्र हीरा सिंह से किया जिससे प्रसन्न होकर रणजीत सिंह ने उसे 'राजगिर' को जागीर भेंट की। संसार चंद की रखैल के पुत्र जोधवीरचंद ने अपनी दो बहनों का विवाह रणजीत सिंह के साथ किया। 1833 ई. में रणजीत सिंह ने अनिरुद्ध चंद की मृत्यु के बाद उसके बेटों (रणबीर चंद और प्रमोदचंद) को महलमेरियो में जागीर दी। वर्ष 1846 ई. में काँगड़ा पूर्ण रूप से ब्रिटिश प्रभुत्व में आ गया। अनिरुद्ध चंद के बाद रणबीर चंद (1828 ई.), प्रमोद चंद (1847 ई.),प्रतापचंद (1857 ई.), जयचंद (1864 ई.) और ध्रुवदेव चंद काँगड़ा के राजा बने





 अर्थव्यवस्था-


काँगड़ा जिले में 1849 ई. में चाय की खेती शुरू की गई। बीर में चाय प्रोसेसिंग उद्योग और 1939 ई. में पालमपुर में चाय फार्म स्थापित.किया। नगरौटा, पालमपुर और शाहपुर में रेशम बीच केन्द्र स्थित है। नगरौद्य में 1936 ई. में मधुमक्खी पालन फार्म स्थापित किया गया। काँगड़ा में 1973 ई.

में दुग्ध योजना शुरू की गई। प्राकृतिक गैस-काँगड़ा के ज्वालामुखी में प्राकृतिक गैस के भण्डार पाए गए हैं। परियोजना-पौगजल विद्युत परियोजना ब्यास नदी पर-396 मैगावाट गज गज विद्युत परियोजना (शाहपुर)-10 मेगावाट।बनेर जल विद्युत परियोजना-12 मेगावाट



धार्मिक स्थान एवं मंदिर-

  1. ज्वालामुखी मन्दिर-अकबर ने इस मंदिर पर सोने का छन चलाया था और फिरोजशाह तुगलक यहाँ से 1300 पुस्तकें फारसी
  2. ब्रजेश्वरी मंदिर-इस मंदिर को महमूद गजनबी ने लूटा था। काँगड़ा जिले में हैं। काँगड़ा के मसरूर रॉक कट मंदिर को हिमाचल प्रदेश का अजंता कहते हैं। बैजनाथ में शिव मंदिर, नुरपूर में गंगा मंदिर, चामुण्डा मंदिर आदि सभा



शिक्षा और स्थान-

काँगड़ा के धर्मशाला में केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। इसका एक भाग देहरा में भी है

  1. हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड-धर्मशाला।धर्मशाला में 
  2. डल झील और हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड का मुख्यालय है। यह बौद्ध धर्म गुरु दलाईलामा का निवास स्थान है। धर्मशाला 'छोटा तिब्बत' या 'छोटा ल्हासा' के नाम से भी जाना जाता है। धर्मशाला में 1865 में सेंट जोस चर्च के पास लॉर्ड एल्गिन को दफनाया गया था। वार मेमोरियल (युद्ध स्मारक) धर्मशाला में है। धर्मशाला में प्रतिवर्ष 340 सेमी. वां होती है। तिब्बत की निर्वासित सरकार का मुख्यालय भी धर्मशाला में है। धर्मशाला का निर्माण 1846 ई. में लॉर्ड मैक्लोड ने किया था। वह पंजाब के भूतपूर्व गवर्नर थे। धर्मशाला में केन्द्रीय विश्वविद्यालय स्थित है।
  3.  विश्वविद्यालय-पालमपुर में कृषि विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना 1978 ई. में की गई थी।
  4.  आबुबैदिक कॉलेज-पपरौला में आयुर्वेदिक कॉलेज है, जिसकी स्थापना 1978 ई. में की गई थी। पपरौला में नर्वोदय स्कूल भी है।
  5. स्थान-काँगड़ा के अन्देटा में शोभा सिंह आर्ट गैलरी है। किताबें एम.एस. रंधावा ने काँगड़ा पेंटिंग और जे.सी. फ्रेंच ने संसार चंद ऑफ काँगड़ा किताब लिखी।
  6. स्थान-त्रिमुण्ड, धर्मकोट कांगड़ा जिले में स्थित है। धर्मकोट को 'छोटा इस्त्राइल' कहा जाता है। धर्मशाला के समीप धर्मकोट में ध्यान (Meditation) के लिए 'विपासना' केन्द्र स्थित है। योल के निकट चिन्मय संदीपनी हिमालय आश्रम स्थित है। घोरान नामक स्थान जादू से रोगमुक्त होने के लिए लोगों में प्रसिद्ध है। दलाईलामा 1959 ई. में धर्मशाला आये थे। गगंध को बटलोहियावाला शहर कहा जाता है।


 जननांकीय आँकड़े-


काँगड़ा की जनसंख्या 1901 ई. में 4,78,364 थी जो 1951 में बढ़कर 5,70,643 हो गई। वर्ष 1971 में कांगड़ा की जनसंख्या 8,00,863 थी जो वर्ष 2011 में बढ़कर 15,10,075 हो गई। काँगड़ा की जनसंख्या में 1901 से 1911 में 1.95% की गिरावट दर्ज की गई। काँगड़ा जिले में सर्वाधिक दशकीय वृद्धि 1961 ई. से 1971 ई. के बीच (23.71%) दर्ज की गई। वर्ष 1911 ई. में कांगड़ा जिले का लिंगानुपात 900 था जो 1951 में 936, 1971 में 1008 और 2011 में बढ़कर 1012 हो गया। वर्ष 2001 में कांगड़ा जिले का लिंगानुपात सर्वाधिक (1025) था। काँगड़ा जिले का जनघनत्व 1971 में 151 से बढ़कर 2011 में 263 हो गया है। काँगड़ा जिले में सर्वाधिक 15 विधानसभा क्षेत्र हैं। काँगड़ा जिले में कुल 20.88%SC और 10. 12%ST की जनसंख्या

है। काँगड़ा जिले में सर्वाधिक SC जनसंख्या निवास करती है। काँगड़ा जिले में कुल 3866 गाँव हैं जिनमें से 3619 गाँच आबाद गाँव हैं। काँगड़ा जिले में 760 पंचायतें है। काँगड़ा जिले की जनसंख्या 2011 में 94.28% ग्रामीण और 5.72% शहरी थी। वर्ष 2009 में कांगड़ा की जन्म दर 19.3 और मृत्यु दर 6.4

थी।


 कांगड़ा का स्थान-

काँगड़ा जिले का क्षेत्रफल 5739 वर्ग कि.मी. है। यह हिमाचल प्रदेश के जिलों में चौथा सबसे बड़ा जिला है। काँगड़ा जिले को जनसंख्या 12 जिलों में सर्वाधिक है। काँगड़ा जिला 2011 में जनघनत्व में पाँचवें स्थान पर है। काँगड़ा जिले में 0.12%ST की जनसंख्या है और बह 10वें स्थान परहै। काँगड़ा जिला दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर (12.77%) में सातवें स्थान पर था। कांगड़ा जिले का लिंगानुपात 2011 में हमीरपुर के बाद सर्वाधिक (दूसरा स्थान) है। काँगड़ा जिला 2011 में शिशु लिंगानुपात के मामले में पिछड़कर 11वें स्थान पर चला गया। वह कना के बाद 876 शिशुलिंगानुपात के साथ 11वें' स्थान पर है। साक्षरता में कांगड़ा जिला 2011 में तीसरे स्थान पर है। किनौर और लाहौल स्पीति के बाद सबसे अधिक ग्रामीण जनसंख्या कांगड़ा जिले में है। काँगड़ा जिले का 35.92% भाग वनाच्छादित है। वह इस मामले में छठे स्थान पर है जबकि वनाच्छादित क्षेत्रफला (2062 वर्ग कि.मी.) के मामले में कांगड़ा जिला तीसरे स्थान पर है। काँगड़ा जिले के केवल 3% भाग में चरागाह है जो 12 जिलों में न्यूनतम है। कांगड़ा जिले में सर्वाधिक भैंसें पाई जाती है। काँगड़ा जिले में सर्वाधिक लघु उद्योग हैं। काँगड़ा जिले में सर्वाधिक (5602 कि.मी.) सड़कों की लम्बाई है। काँगड़ा जिले में (2011-12 में) सर्वाधिक कटहल, आँवला, लौकाठ, अमरूद, लीची, आम, नींबू, माल्य, और सहारे का उत्पादन होता है। आडू, प्लम, गलगल, अनार, के उत्पादन में काँगड़ा दूसरे स्थान पर है।













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