HP Polity part 1

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 हिमाचल प्रदेश का प्रशासन एवं राजनीति


Himachal Pradesh का गठन (1948)

आजादी के बाद की घटनाएँ-15 अगस्त, के नेतृत्व में शांगरी रियासत की राजधानी बड़गाँव में हुआ, जिसमें भागमल सौहटा, स्वामी पूर्णानन्द, सदाराम ठाकुर, हरिदास, सूरत प्रकाश आदि नेता शामिल हुए। इस अधिवेशन में पहाड़ी रियासत को मिलाकर पहाड़ी प्राँत बनाने की केन्द्रीय सरकार से मांग की गई। 


सोलन सम्मेलन-

26 से 28 जनवरी, 1948 तक राजाओं और प्रजामण्डल के प्रतिनिधियों का सम्मेलन बघाट के राजा दुर्गासिंह की अध्यक्षता में सोलन के दरबार हाल में हुआ। इसमें केवल शिमला की पहाड़ी एक "गोशियेटिंग कमेटी" बनाई गई। इस कमेटी में बघाट के राजा दुर्गा सिंह, जुब्बल के भागमल सौहटा, बुशैहर के ठाकुर सेन नेगी व सत्य देव बुशैहरी, बाघल के कंवर मोहन सिंह व हीरा सिंह पाल आदि आठ सदस्य शामिल थे। इस समिति का कार्य अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए दूसरी पहाड़ी रियासतों से तथा भारत सरकार के राज्य मंत्रालय से बातचीत करना था। इस बैठक में भारत को 1 मार्च, 1948 तक “हिमाचल प्रदेश" के अस्तित्व में आ जाने के बारे में सूचित करने का निर्णय लिया गया।


 अस्थाई सरकार-

प्रजामण्डल के दूसरे गुट "हिमालयन हिल स्टेट्स सब-रीजनल कौंसिल" के सदस्य पं. पद्मदेव और डॉ. यशवन्त सिंह परमार यासती संघ के प्रस्ताव के विरुद्ध थे। उन्होंने भी जनवरी, 1948 को मण्डल के इस गुट ने इस बात पर जोर दिया कि सभी रियासतें भारतीय संघ में मिल जाएँ। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने शिमला में एक" हिमालय प्रान्त” प्रोविजनल गवर्नमैंट अर्थात् अस्थाई सरकार स्थापित की। इसके मुखिया शिवानन्द रमौल बनाए गए। इस गुट ने सुकेत के राजा को संदेश भेजा कि वह अपनी रियासत को 48 घंटे के भीतर भारतीय संघ में विलीन कर दें अन्यथा उसके विरुद्ध सत्याग्रह आरम्भ कर दिया जाएगा।


 सुकेत सत्याग्रह-

18 फरवरी, 1948 को पं. पद्मदेव के नेतृत्व में कुछ सत्याग्रही तत्तापानी के रास्ते से सुकेत रियासत में दाखिल हुए। उन्होंने तहसील मुख्यालय पर अधिकार कर लिया। पं. पदमदेव, शिवानंद रमौल, डॉ. देवेन्द्र के डिप्टी कमिश्नर कन्हैया लाल फौजी टुकड़ी के साथ सुन्दरनगर पहुँच गए। चीफ कमिश्नर नगेश दत्त ने सुकेत रियासत पर भारत सरकार के अधिकार की घोषणा कर दी।


नैगोशियेटिंग कमेटी के सदस्य का ज्ञापन-

राजा दुर्गा सिंह बघाट की अध्यक्षता में बनी “यह भी लिखा कि शिमला की पहाड़ी रियासतों ने पहले ही स्वयं को एक राज्य के रूप में संगठित कर दिया है और इसका नाम “हिमाचल प्रदेश" रखा है। इसके अतिरिक्त एक विधान समिति भी बनाई गई है, जिसे सभी रियासतों ने अपने अधिकार सौंप दिए हैं।


शिमला हिल्ज स्टेट का विलय ( 8 मार्च, 1948 )-

भारत सरकार के राज्य मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट्स) की दिल्ली में 2 मार्च, 1948 को शिमला और पंजाब की पहाड़ी । अगले दिन पहाड़ी रियासतों के भागमल सौहटा-बुशैहरी धड़े ने सरदार पटेल को सोलन सम्मेलन का प्रस्ताव पेश किया और उसमें पहाड़ी रियासतों को मिलाकर एक अलग पहाड़ी प्राँत “हिमाचल प्रदेश" के गठन की स्वीकृति देने की अपील की। सरदार पटेल ने इस शिष्टमण्डल को सचिव वी.पी. मेनन से रियासतों के राजाओं ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। राज्य मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट्स) के सचिव ने केन्द्रीय सरकार की ओर से.पहाडी रियासतों के विलय से एक अलग प्रान्त “हिमाचल प्रदेश" के निर्माण की घोषणा कर दी। इस प्रकार 8 मार्च, 1948 को शिमला हिल्ज के 26 पहाड़ी रियासतों के विलय से "का ही अनुमोदन.किया। इस प्रकार सोलन सम्मेलन के प्रस्ताव के अनुसार-"हिमाचल प्रदेश" का जन्म हुआ।


 नालागढ़ (हिण्डूर) का पेप्सू (पंजाब) में विलय-

शिमला की पहाड़ी रियासतों में का विलय कर दिया और नालागढ़ ने पटियाला तथा पंजाब की अन्य रियासतों के साथ मिल कर 5 मई को

विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।


अन्य पहाड़ी रियासतों का हिमाचल में विलय

  1. मण्डी-मण्डी के राजा जोगेन्द्र सेन आरम्भ से ही इसमें रुचि लेते रहे और बातचीत में भाग लेते रहे। सरकार ने इन दो रियासतों को “हिमाचल प्रदेश" में मिला दिया।

  2. चम्बा-चम्बा के राजा लक्ष्मण सिंह अभी तक भी अपनी रियासत को हस्तान्तरित करने से पुलिस भेजी और राजा को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करत हेतु कहा और राजा ने विवश होकर हस्ताक्षर कर दिया 

  3. सिरमौर-सिरमैर के महाराजा राजेन्द्र प्रकाश अन्तिम घड़ी में भी अपनी रियासत को बचाने का पूरा ई. को केन्द्र से वित्त सचिव इ.पी. कृपलानी नाहन पहुँचे। उन्होंने महाराजा सिरमौर के साथ नाहन का विशाल जनसभा को सम्बोधित किया तक हिमाचल प्रदेश मुख्य आयुक्त क्षेत्र रहा और यहाँ पर 3 मुख्य आयुक्त बने। एन. सी. मेहता. ई. पेन्डरल मून तथा भगवान मकर जो हिमाचल प्रदेश के आखिरी मुख्य आयुक्त रहे। हि.प्र. के जन्म (1948) के समय इसका क्षेत्रफल 27,108 वर्ग कि.मी. तथा आबादी 9.3500



बिलासपुर राज्य का विरोध-

बिलासपुर के राजा आनन्द चन्द आरम्भ से ही बिलासपुर के भारतीय संघ में विलय करने का विरोध करते आ रहे थे। वह

स्वतन्त्र कहलूर की बात कर रहे थे। राज्य मन्त्रालय के सचिव ने राजा आनन्द चन्द से दिल्ली और बिलासपुर में कई बार बातचीत की।


1.हि.प्र. का परिदृश्य

(1.1) चीफ कमिश्नर की सलाहकार परिषद् -

राजाओं के तीन सदस्य थे-राजा मण्डी, राजा चम्बा और राजा बघाट। इस समिति का गठन सितम्बर 1948 ई. को किया गया। इसका उद्देश्य चीफ कमिश्नर को आम नीति, विकास योजना, संविधान सम्बन्धी सलाह देना था परन्तु प्रशासन की ओर से इसकी अनदेखी किए जाने से वह 1951 ई. में इससे अलग हो गए। तत्पश्चात् डॉ. यशवन्त सिंह परमार संविधान सभा के सदस्य बने। उन्होंने तथा हिमाचल के अन्य कांग्रेस नेताओं ने प्रदेश तथा दिल्ली में हिमाचल प्रदेश में लोकप्रिय सरकार की व्यवस्था के लिये केन्द्रीय सरकार से संवैधानिक संघर्ष किया। अंततः केन्द्रीय सरकार ने हिमाचल प्रदेश को 1951 में पार्ट सी स्टेट का दर्जा देकर इसके लिये

विधानसभा का प्रावधान किया।


(1.2) 1950 ई. में हि.प्र. से हस्तान्तरित और हि.प्र. में शामिल किए गाँव

1950 में महासू का पुनर्गठन किया गया। 

  1. कोटखाई-कोटखाई को स्वतंत्र उप-तहसील का दर्जा देकर उसमें कोटखाई, खनैटी, धनकोटी, कुमारसेन और बलसन का कुछ भाग सम्मिलित किया गया।

  2. कुमारसेन-कोटगढ़ को कुमारसेन में मिला दिया गया।

  3. जुब्बल-उत्तर प्रदेश में सनसोग और भाटर को जुब्बल तहसील में मिलाया गया।

  4. कुसुम्पटी-पैप्सू का चबरोट क्षेत्र कुसुम्पटी तहसील में मिलाया गया।

  5. सोलन-नालागढ़ के सात गाँव सोलन तहसील में मिलाए गए।

हि.प्र. में शामिल गाँव।

  1. पंजाब से सोलन कैण्ट, कोटगढ़, कोटखाई

  2. पैप्सू से-कुफरी, धार, खनलोग, गोलिया, जमराह, सुरेटा। हि. प्र. से हस्तान्तरित गाँव

  3. पंजाब को-संजौली, भराड़ी, चक्कर, प्रोस्पेक्ट हिल, कुसुमपटी, पट्टी रिहाना

  4. पैप्सू को-रामपुर, वाकना, कोटाह, भरी।


(2) हि.प्र. का परिदृश्य


(2.1).'ग' श्रेणी का राज्य हिमाचल-

डॉ. यशवंत सिंह परमार 24 मार्च 1952 के हिमाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। के. एल. मेहता 1952 ई. में हि. प्र. के पहले मुख्य सचिव बने। हि. प्र. विधानसभा का प्रथम सत्र 19 की राष्ट्रपति निवास (वायसरीगल लॉज) में हुआ जिसका उद्घाटन उपराज्यपाल मे. ज. हिम्मत सिंह ने किया। वर्ष 1952-56 के बीच विधानसभा की कार राष्ट्रपति निवास (वायसरीगल लॉज) हिमाचल धाम और कौंसिल चेम्बर में हुई।


(2.2)  बिलासपुर का हि.प्र. में विलय-

पं. नेहरू ने लोकसभा में बिलासपुर के हिमाचल प्रदेश में विलय की घोषणा कर दो। अंतत: एक जुलाई, 1954 ई. को बिलासपुर का हिमाचल प्रदेश में विलय हुआ और वह राज्य का पाँचवाँ जिला बना। हि.प्र. में बिलासपुर के विलय के बाद क्षेत्रफल 27,018 + 1168 = 28,186 वर्ग कि.मी. हो गया। विलासपुर को शामिल करने के बाद विधानसभा सदस्यों की संख्या 41 हो गई।


(2.3) राज्य पुनर्गठन आयोग-

हिमाचल प्रदेश की विधानसभा ने भी प्रो. तपीन्द्र सिंह की अध्यक्षता में एक नैगोशियेटिंग कमेटी बनाकर एक रिपोर्ट तैयार की और भारत सरकार को प्रस्तुत की। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री डॉ. यशवन्त सिंह परमार ने 23 अप्रैल,1954 ई. को आयोग के सदस्य सईद फज़ल अली को विस्तारपूर्वक एक पत्र भी लिखा। 1956 ई. में राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट में आयोग के अध्यक्ष ने हि.ए के अलग अस्तित्व का समर्थन किया लेकिन बाकी दो सदस्यों ने हि.प्र. को पंजाब में शामिल करने की सिफारिश कर दो। लेकिन डॉ. परमार के प्रयासों से हिमाचल अपना अस्तित्व बचाए रखने में कामयाब रहा। 1956 ई. को हिमाचल प्रदेश को केन्द्रशासित प्रदेश बनाया गया और बजरंग बहादुर इस केन्द्रशासित प्रदेश के पहले उपराज्यपाल बने। हिमाचल प्रदेश 1956 से 1971 ई. तक केन्द्रशासित प्रदेश रहा। बहादुर सिंह 1971 में हिमाचल के 5वें और आखिरी उपराज्यपाल थे।


(3) हि.प्र. का परिदृश्य


(3.1) क्षेत्रीय परिषद् -

1957 ई. में क्षेत्रीय परिषद् (टेरीटोरियल कौंसिल) के लिये चुनाव हुए मण्डी के चच्योट के ठाकुर कर्म सिंह ने 15 अगस्त, 1957 ई. को परिषद् के अध्यक्ष की शपथ ली। प्रशासन के सभी अधिकार उप-राज्यपाल के पास थे। क्षेत्रीय परिषद् केवल एक स्थानीय स्वशासन मात्र थी। प्रदेश के विकास कार्य तथा वित्त व अर्थव्यवस्था जैसे मामलों में इसकी कोई पूछ नहीं थी।


(3.2) किन्नौर छठा जिला-

किन्नौर जिले में निचार, कल्पा, सांगला तीन तहसीलें तथा मुरंग, पूह और हांगरांग उपतहसीलें बनाई गईं। महासू जिले की रामपुर तहसील के 14 गाँव किन्नौर जिले में 1960 में शामिल किए गए।


(3.3) हिमाचल विधानसभा का निर्माण-

लोकसभा ने 1963 ई. में 'गवर्नमैंट ऑफ यूनियन एक्ट 1963'' पारित किया। इसके फलस्वरूप पहली जुलाई, 1963 को हिमाचल प्रदेश क्षेत्रीय परिष्ट हिमाचल प्रदेश विधानसभा में परिवर्तित कर दिया गया तथा तीन सदस्यीय मन्त्रिमण्डल का गठन हुआ। 1963 में डॉ. यशवन्त सिंह परमार दूसरी = मुख्यमंत्री बने।


(3.4) हुकम सिंह समिति (पंजाब स्टेट पुनर्गठन आयोग-1965)-

भारत सरकार ने सन् 1965 ई. में "पंजाब स्टेट पुनर्गठन आयोग'' नियुक्त किया। हिमाच सरकार ने भी भारत सरकार को "विशाल हिमाचल'' का पूरा मसौदा भेज दिया और पंजाब स्टेट रि-आर्गेनाइजेशन कमीशन के अध्यक्ष हुक्म सिंह को

यह मसौदा दिया।

  1. षायी और सीमा के आधार पर काँगड़ा, लाहौल-स्पीति और कुल्लू जिलों को हिमाचल प्रदेश में सम्मिलित किया जाए। ये क्षेत्र हिमाचल के अधिक समीप भी हैं। इन क्षेत्रों के चुने हुए प्रतिनिधि भी समय-समय पर हिमाचल प्रदेश में विलय की माँग करते रहे हैं।

  2.   रूप से जोड़ने में सहायता मिलेगी। शिमला नगर जो एक केन्द्रीय प्रादेशिक राजधानी के रूप में विद्यमान है, इन क्षेत्रों के विलय के बाद हिमाचल प्रदेश की स्थाई राजधानी बन सकती है।

  3. जिसकी अवधि समाप्त हो चुकी है। नालागढ़ उपमण्डल, कालका उप-तहसील, मोरनी और कलेसर के शिवालिक क्षेत्र को हि.प्र. में मिलाया जाए।

  4. नालागढ़ के राजा ने पटियाला के शासक परिवार से पारिवारिक सम्बन्ध होने के कारण अपने राज्य को “पैप्सू राज्य" में मिला लिया


(4) हि.प्र. का परिदृश्य


 (4.1)पंजाब का पुनर्गठन और विशाल हिमाचल-

1 नवम्बर, 1966 ई. को पंजाब का पुनर्गठन किया गया जिसके बाद पंजाब से निम्न क्षेत्र हि.प्र. में शामिल किए गए

  1.  काँगड़ा,

  2. अम्बाला

  3. गुरदासपुरजिला होशियारपुर से-लोहारा, कि.मी. हो गया। डॉ. यशवंत सिंह परमार 1967 ई. के चुनाव में जीतने के बाद तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। हि.प्र. की जनसंख्या 28,12,463 हो गई।


1966 ई. में 4 नए जिलों का प्रशासन

  1. जिला काँगड़ा-6 तहसीलें

  2. जिला कुल्लू-1

  3. जिला शिमला-2  

  4. (नालागढ़)।

(4.2) पूर्ण राज्य की प्राप्ति ( 25 जनवरी, 1971)-

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने शिमला के रिज मैदान

पर हि.प्र. को देश का 18वाँ राज्य बनने की घोषणा की। 25 जनवरी, 1971 को हिमाचल प्रदेश देश का 18वाँ पूर्ण राज्य बना और डॉ. यशवंत सिंह परमार पूर्ण राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। 25 जनवरी, 1971 को हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद एस. चक्रवर्ती हिमाचल प्रदेश के प्रथम राज्यपाल (गर्वनर) बने। पूर्ण राज्य प्राप्ति के बाद देशराज महाजन विधानसभा अध्यक्ष बने।


4.3)जिलों का पुनर्गठन (1972)- 

पूर्ण राज्य बनने के समय हिमाचल प्रदेश में 10 जिले थे। 1972 में जिलों का पुनर्गठन किया गया। काँगड़ा जिले को विभाजित कर ऊना व हमीरपुर जिलों को बनाया गया, वहीं शिमला, महासू का पुनर्गठन कर शिमला व सोलन जिलों का निर्माण किया गया। आज हिमाचल प्रदेश में 12 जिले-चम्बा, सिरमौर, मण्डी, बिलासपुर, किन्नौर, काँगड़ा, कुल्लू, लाहौल-स्पीति, शिमला, सोलन, ऊना व हमीरपुर है। 1 सितम्बर, 1972 ई. को हि.प्र. में 35 तहसीलें और 9 उप-तहसीलें शामिल थीं।

1972 में जिलों की प्रशासनिक व्यवस्था-

  1. जिला काँगड़ा-4 तहसीलें (काँगड़ा, पालमपुर, नूरपुर और देहरा गोपीपुर)

  2. जिला हमीरपुर-2 तहसीलें (हमीरपुर, बड़सर)

  3.  जिला ऊना-1 तहसील (ऊना), 1 उप-तहसील (अम्ब)।

  4. जिला शिमला ( महासू और शिमला जिले से)-6 तहसीलें (शिमला, ठियोग, रामपुर, चौपाल, जुब्बल और रोहणू)

  5. जिला सोलन (महासू और शिमला जिले से)-4 तहसीलें (सोलन, अर्की, नालागढ़, कण्डाघाट)।






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